Tuesday, February 5, 2013

ओ पल

आँखों के पर्दों पे प्यारा सा था जो नजारा 
धुआ बन के उड़ चला अब न रहा वो 
बीते जिनके संग वो पल मस्ती के 
सब कुछ ख़तम अब कुछ न रहा !

उन खट्टी मीठी यांदो को पलकों पे अपने सजा के 
टिमटिमाते चेहरों को दिल में बसा के 
छोड़ के उन मस्ती को छाओं  तले हम 
उड़ चले अब नयी  गगन की सफ़र पे !
कॉलेज की अनोखी घटाओ की फिजा को 
रिमझिम बारिस की बूंदों की बहारो को 
हरी भरी  मनमोहक प्रकृति की नजारो  को 
छोड़ चले हम न जाने कहा अब चले !
जाने अनजाने में जो मुझसे कोई भूल हुई 
माफ़ करो यार्रो अब ना कोई खिस्वा रखो 
ये चार साल के सुनहरे पल तुम सब की यादों के 
यांद  बहुत आयेंगे तेरे बिना हर पल पल!
लिखना चाहू मैं तुम सब के संग  बिताये पलो को 
पर पे कम्बखत  हाथ अब ये चलते नहीं 
ऐसा लगता है की जैसे ये गगन बिन मेंघो के 
सिंचित नहीं करते धरती को अपनी पगों से !



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