Tuesday, February 5, 2013

जिन्दगी की समां

जिन्दगी की समां  को कभी बुझने ना  दो
अपनी अरमा को कभी मिटने ना दो
चाहे मुश्किल बढें  या  हो जुल्मो -सितम
लहरों की तरह आगें तुम बढते  रहो !

हो खुद पे अगर यकीन तो हौसला रखो
इस  सितम ये ज़माने की परवाह ना करो
आशा के किरण की ज्योति की प्रज्ज्वलित किये
संघर्घ के मार्ग पे आगें बढते  रहो !

जिंदगी ये हमारी बड़ी अनमोल है
किसी की खातिर इसे कभी रुकने न दो
अगर बदलना है तो अपने विचारो को बदलो
आज के सकारात्मकता का कफ़न बांध लो !

है किसका इंतजार   बेखबर  इतना क्यू  हों
आंगे की चुनौती से भयभीत तुम क्यू  हों
अँधेरा कितना भी घना हों फिर भी मगर
प्रज्वलित  दीप के आंगें कभी ठहरता नहीं !

 जिन्दगी की अहमियत को समझो अभी
इसे अब कभी तुम फिर रुकने ना दो
कर लो दृढ़ संकल्प तुम अभी के अभी
ना हटोगे तुम पींछे मुड़कर कभी !




 

ओ पल

आँखों के पर्दों पे प्यारा सा था जो नजारा 
धुआ बन के उड़ चला अब न रहा वो 
बीते जिनके संग वो पल मस्ती के 
सब कुछ ख़तम अब कुछ न रहा !

उन खट्टी मीठी यांदो को पलकों पे अपने सजा के 
टिमटिमाते चेहरों को दिल में बसा के 
छोड़ के उन मस्ती को छाओं  तले हम 
उड़ चले अब नयी  गगन की सफ़र पे !
कॉलेज की अनोखी घटाओ की फिजा को 
रिमझिम बारिस की बूंदों की बहारो को 
हरी भरी  मनमोहक प्रकृति की नजारो  को 
छोड़ चले हम न जाने कहा अब चले !
जाने अनजाने में जो मुझसे कोई भूल हुई 
माफ़ करो यार्रो अब ना कोई खिस्वा रखो 
ये चार साल के सुनहरे पल तुम सब की यादों के 
यांद  बहुत आयेंगे तेरे बिना हर पल पल!
लिखना चाहू मैं तुम सब के संग  बिताये पलो को 
पर पे कम्बखत  हाथ अब ये चलते नहीं 
ऐसा लगता है की जैसे ये गगन बिन मेंघो के 
सिंचित नहीं करते धरती को अपनी पगों से !



Wednesday, March 7, 2012

होली की गुजिया रंगों के फुहार दही बड़े मिठाई और दोपहर भर का खुमार
कभी कभी धड़कन रुक सी जाती है, कभी कभी पुराने दिनों की याद आते है!
आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाये!

Wednesday, February 22, 2012

रिमझिम इन घटाओ में
तेरी मुस्कराहट क्या खूब सवरती है
बादलों की इन करकराहट में
सबनम की मोती बिखेरती है

ये जमाना कागजी फूलो पे
अपनी जां छिड़कता है
पर तू है की इन सबसे अलग
अपनी ही खुसबू में महकती है

मचलती तेरी ये कमसिन अदाए
दिल को यूं सींच जाती हैं
भटकती इन राहों के डगर में
उम्मीद का एक अहसास कराती हैं

तू ख्वाब है या हाकीत है
तनिक ना अहसास हैं मुझको
तेरी मचलती इस कहानी का
तनिक ना आभास है मुझको

तेरी ये बहकती नज़ारे
अधखुली आखो में भी सपन जगाती हैं
दिल के हर रोम रोम में ये
खिलते हुए चमन का आभास कराती हैं

दिल है प्यार मुहब्बत का
दिलो से दिल मिलाने का
पर दिलो की इन चाहतो में
आँखों की शूरमा को  क्यों बिखलाते हो!

जला के रख कर देती है
ये नफरते ज़माने को
भूत, भविष्य के लम्हे में
दिल को क्यू जलाते हो

समझ में ये नहीं आता
कि क्यूँ इतना नाज है इसपे
दिलो से दिल मिलाने को
इतना बेताब क्यू है ये!

आखिर राज क्या है इसका
जो ज़माने को पागल  बनाती है
इन मडराती कुमुदिनी पे
अपनी गुनगुनाहट को क्यू बिखलाती है
क्यू सोचते हो इतना ज्यादा
क्यू न अभ्यास करते हो
महारथ में निपुण होने का
क्यू ना प्रयास करते हो!

खुद के मनोबल पे
क्यू संदेह करते हो
जिसकी सीमा ना कोई है
उसपे विराम क्यू लगाते हो

जो गुजर जाता है यूं ही
पलटकर क्यू देखते हो
आगे की चुनौती से यूं
खुद से क्यू भागते हो

जिस तरह भ्रमर कुमुदुनी के रस का पान करती है
चुभन के आशंका की ना  ओं परवाह करती है
तपकर लौह भी जिस तरह अपने अस्तित्व पे नाज करता है!
फिर धधकती इन लपटों में जलने से क्यू डरते हो

भ्रमर की गुनगुनाहट से जिस तरह हर फूल डरता है
फिर अपनी गुनगुनाहट का क्यू ना आगाज करते हो



आगोश भी है , आक्रोश भी है
थपेड़े सहने का मुझमे समावेश भी है
कहर का दरिया भी है,चमकता सूरज भी है
पनपती इन लपटों को झेलने का साहस  भी है
उमड़ती इस कौतूहल का आहट भी है

अभिलाषा भी है, जिज्ञासा भी है
हर मोड़ पे कभी कभी निराशा भी है
बेचैनी भी है , ज्वलनशीलता भी है
दुनिया की कितनी गजब परिभाषा भी है

मादकता भी है सहजता भी है
सफलता के एक किरण की आशा भी है
हलचल भी है, झुनझुनाहट भी है
दिल में उमड़ती कमल के हिचकोले भी है

बचपना भी है , यौवंकता  भी है
जिंदगी के अनेक रूप की गाथा भी है
मिलना भी है ,बिछड़ना भी है
नए रिश्तो से जुड़ने की जयगाथा भी है

भावार्थ बदलते है लोग फिर भी सवरते है
जिंदगी के व्याकरण की गजब परिभाषा भी है
हर पल को जी लेने की एक आशा भी है