जिस डाली पर खुद बैठे हो , मत मारो उस पर कुल्हाडिया |
अन्यथा अगर टूटी डाली, न रहेगी शिखा हमारी न रहेगी दाढ़िया|
शासन होगा तब शत्रु का, फिर त्राहि त्राहि मच जायेगी |
सीता साबित्री की इज्जत, अरि उंगुली पर नच जायेगी |
अब नहीं गये राम यहाँ जो , जो जंग ले सके रावन से |
इसलिए निवेदन करता हूँ , सीता साबित्री पावन से |
ऐ सुनो देश की सिहनियो ,शत्रु पर खुद ही टूट पडो |
काली चंडी दुर्गा बनकर , ज्वालामुखी सा फूट पडो
This poem is written by one of my friend SANTOSH..
i love it ...so posted it at my blog..
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