Wednesday, February 22, 2012

क्यू सोचते हो इतना ज्यादा
क्यू न अभ्यास करते हो
महारथ में निपुण होने का
क्यू ना प्रयास करते हो!

खुद के मनोबल पे
क्यू संदेह करते हो
जिसकी सीमा ना कोई है
उसपे विराम क्यू लगाते हो

जो गुजर जाता है यूं ही
पलटकर क्यू देखते हो
आगे की चुनौती से यूं
खुद से क्यू भागते हो

जिस तरह भ्रमर कुमुदुनी के रस का पान करती है
चुभन के आशंका की ना  ओं परवाह करती है
तपकर लौह भी जिस तरह अपने अस्तित्व पे नाज करता है!
फिर धधकती इन लपटों में जलने से क्यू डरते हो

भ्रमर की गुनगुनाहट से जिस तरह हर फूल डरता है
फिर अपनी गुनगुनाहट का क्यू ना आगाज करते हो



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