रात्रि की इस निद्रा में यू ही
सिलवटे बदल रहा था मैं
तभी कुछ कहकहे और सनसनाहट ने
मेरी निद्रा की सिलवटे बदल डाली!
उठ कर इस सुप्रभात में
कुछ पल यू ही सोचता रहा
फिर निकल पड़ा उस डगर पे
जिसकी कोई न निशा थी
इन सन्नाटो में पक्षियों की चाह्चाहतो में
प्रकृति की इस खूबसूरती और खुद की चितवन में
खुद को टटोलने की इस सार में बिलीन हो गया
अपनी शब्द रूपी इच्छाओ में खुद मैं लीन हो गया
खोकर इन नजारो में जाने खा चला गया
सोचा लौट चलू यहाँ से पर दिल ने मुनासीब न समझा
विश्राम की शत्र छाया में जैसे ही पैर बढें
दिल ने ग़ालिब की इस इच्छा को नजरंदाज कर दिया
सोचा कर लू शैर आज कही दूर चलू जाऊ
लौटने की इच्छाओ से खुद से मुकर जाऊ
पर दिल ने कहा ये जिंदगी इक दिन की तो नहीं
इस कश्ती की मझदार की ये सीमा नहीं !
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